चाहत बेटे की /बलिदान बेटियों की
रूपलाल के पहले से दो बेटियां थी बड़ी बेटी 17 साल की हो चुकी थी।
और छोटी बेटी 9 साल की थी रूपलाल का एक भी बेटा नहीं था
रूपलाल के मन में बेटे की चाहत थी ।
और रूपलाल के पत्नी के मन में भी बेटे की चाहत थी।

5 साल बाद रूपलाल के पत्नी नंदिनी के पेट में बच्चा रह गया ।
रूपलाल और उसकी पत्नी ने गांव वालों के बात को मानकर मेडिकल चेकअप करवाया।
मेडिकल चेकअप में जहां-जहां पर चेकअप हुआ
वहां पर सभी डॉक्टरों ने कहा यह लड़का है ।
और लड़के की चाहत में पूरा परिवार खुशी से झूम उठा था।
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पिता का साया अब तक की सबसे सुपरहिट (कहानी राइटर पवन सागर द्वारा )
चारों तरफ बेटे की किलकारी सुनने के लिए कान सूने पड़ कान सूने पड़े थे ।
आखिरकार वह भी दिन आया जब नंदिनी ने एक बेटे
को चाहत में जो बच्चा को पाल रही थी वह बेटी जन्म ली ।
बेटी के आने से घर में चारों तरफ उदासी छा गई ऐसा लग रहा था
जैसे घर में चारों तरफ सूना सूना सा हो गया है ।
और गांव में तरह-तरह के लोग बातें करने लगे कि अगर बेटी ही करना था
तो क्या पहले से दो बेटियां कम थी।
गांव वाले नंदिनी और उसके पति दोनों को बहुत सारे ताने देने लगे ।
नंदिनी के पति पैसे से एक आंख के डॉक्टर थे
जो बहुत अच्छे पढ़े लिखे इंसान थे ।
और अच्छे बुरे का उन्हें बहुत अच्छे से ज्ञान था।
गाँव के लोगों का सोच
गांव के कुछ लोगों ने नंदनी को कहा :
कि इस बेटी को तुम ड्रॉप कर दो इस बेटी को बेच दो ।
लेकिन रूपलाल ने किसी की एक न सुनी ।
रूपलाल ने उसे बेटी को बहुत ही अच्छे से पालने पहुंचने का निर्णय लिया
और अपनी पत्नी से कहा :
” अगर भगवान ने हमारे घर बेटी दिया है तो कुछ सोच समझ कर ही दिया है,
हम इसे अच्छे से पाल पोसकर इसे कामयाब बनाने की कोशिश करेंगे । “
6 दिन बाद रूपलाल और उसकी पत्नी नंदिनी ने गांव के
सभी लोगों को छतरी के लिए आमंत्रित किया ।
और अपने रिश्ते रिश्तेदारों को भी बुलवाया और एक बेटी के जन्मदिन पर केक लाया ।
और पूरे धूमधाम से बेटी के आने की खुशी में डीजे बजाकर सभी ने बहुत आनंद लिया ।
गांव के कुछ लोगों ने रूपलाल को अच्छा कहा तो गांव के कुछ लोगों ने रूपलाल को बहुत ही बुरा कहा: ।

लेकिन रूपलाल जो करता अपने मन की करता
और हमेशा अच्छा करने की कोशिश करता हूं ।
और इस प्रकार से रूपलाल ने अपनी बेटी का नाम आस्था रखा ।
और आस्था को पढ़ने लिखने में कोई कसर नहीं करता खुद भूखे रहता।
आस्था के शिक्षा
लेकिन आस्था के परवरिश में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं आने दिया ।
दिन महीने साल बीतते गए अब आस्था इंटर में प्रवेश कर चुकी थी ।
आस्था के बड़ी बहन और मछली मझली की भी शादी हो चुकी थी।
दोनों बहनों के बाल बच्चे भी हो चुके थे ।
अब आस्था के पिताजी रूपलाल बुजुर्ग टाइप के इंसान हो चुके थे
और अब वह घर बैठ चुके थे ।
क्योंकि किसी ने अस्पताल को बंद करवा दिया था ।
जहां वह इलाज करते थे उसे अस्पताल को किसी कारण से बंद करवा दिया गया था ।
अब परिवार में आर्थिक तंगी का मामला चल रहा था
और ऐसे में आस्था की पढ़ाई में रुकावट आने लगी थी ।
कुछ रिश्तेदारों और गांव वालों ने रूपलाल को कहा आस्था की पढ़ाई बंद कर दो
और अब इसकी शादी कर दो लड़की जवान हो चुकी है।
लेकिन रूपलाल ने अपनी बेटी के पढ़ाई और लगन को देखते हुए
ऐसा करना ठीक नहीं समझा ।
रूपलाल ने एक बहुत ही बड़ा निर्णय लिया
और अपने सबसे कीमती खेत बाजार के सामने वाले खेत को बेचने का निर्णय लिया
जिस खेत का कीमत 13 लाख रुपया था।
रूपलाल के पास एक वहीं जमीन था जिससे रूपलाल जिंदगी में कुछ कर पाता ।
रूपलाल ने सबसे पहले अपनी बेटी आस्था से बात किया
और कहा बेटी मैं तुम्हारे लिए जमीन बेच रहा हूं ।
तुम जिंदगी में कोई ऐसा काम मत कर देना
जिससे हम मौत को गले लगाने पर व्याकुल हो जाए ।
आस्था ने पापा को गले लगाते हुए कहा
पापा आपका विश्वास ही हमारी जिंदगी की सबसे बड़ी पूंजी है।
पिता का का विश्वास
मैं ऐसा कोई भी काम नहीं करूंगी जिससे हमारे परिवार को ठेस पहुंचे ।
रूपलाल ने बाजार वाले खेत को बेचकर सारा पैसा आस्था के पढ़ाई में लगा दिया ।
3 साल बाद आस्था डॉक्टर की पढ़ाई करने के लिए लंदन चली गई ।

लंदन में जाकर आस्था पढ़ाई पूरी करके जब भारत आई तब भारत
के बड़े-बड़े डॉक्टर उसके सामने घुटने टेक दिए ।
अब आस्था ब्रेन की डॉक्टर है यानी माथे की डॉक्टर है जिसकी
एक दिन की कमाई 40 से 50 लख रुपए है ।
अब आस्था सिर्फ भारत में नहीं पूरे दुनिया में इलाज के लिए मशहूर है

जो सिर्फ ब्रेन का इलाज करती है।
7 साल बाद वह दिन भी आया जब आस्था अपने माता-पिता
को इंडिया में नहीं लंदन में घर गिफ्ट कर रही है ।
और महंगी महंगी बीएमडब्ल्यू जैसी कर में अपने माता-पिता को घूम रही है।
अब गांव के लोग जो रूपलाल को और नंदिनी को भला बुरा कहते थे।
वही आज रूपलाल और नंदिनी और उसकी बेटी आस्था पर नाज करते है ।
अब तो वह दिन भी आ चुका है
जब इंडिया के बड़े-बड़े करोड़पति नंदिनी के
एक झलक और एक सिग्नेचर के लिए दिनों दिन इंतजार करते हैं ।
महीना भर इंतजार करते हैं ।
( दोस्तों राइटर पवन सागर द्वारा लिखा गया या कहानी सच्ची घटना पर आधारित है।
जिसे काल्पनिक रूप से राइटर पवन सागर द्वारा लिखा गया है ।
मैं पवन सागर सारे समाज के बुद्धिजीवी लोगों से विनम्र निवेदन करता हूं।
की बेटा बेटी में कभी भी फर्क ना करें।
और सही शिक्षा और सही संस्कार से हमारा गाँव ही नहीं पूरा भारत को सजाया जा सकता है )
कहानी से शिक्षा

इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है।
कि बेटा बेटी में कभी भी फर्क नहीं करना चाहिए।
सही संस्कार और सही शिक्षा देने से बेटी भी वह कर सकती है जो बेटा कर सकता है।