प्रस्तुत है पिता का साया अब तक की सबसे सुपरहिट कहानी राइटर पवन सागर द्वारा लिखा गया है ,
दोस्तों यह सिर्फ एक कहानी नहीं है यह दिल की वह दास्तां है
जिसे हर बेटे को हर पिता को जरूर आभास होना चाहिए इस कहानी के माध्यम
से दिल की भावनाओं को अब तक पहुंचाने का काम किया है राइटर पवन सागर ने
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अधूरी मोहब्बत की सजा सच्ची घटना पर आधारित
पिता की जिज्ञासा
संजय छोटे से गांव पथरा का रहने वाला था। उसके पिताजी लखन बहुत ही मेहनती
और बहुत ही खुद्दार किसान थे.
जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी अपने पूरे परिवार के खुशियों के लिए लगा दी संजय अपनी पढ़ाई में बहुत अच्छा था .
लेकिन हमेशा सोचता था .कि अभी बहुत समय है बाद में पिता के साथ वक्त बिताऊंगा
बाद में अपनी पूरी इच्छाएं पूरा करूंगा.
लखन अपने बेटा संजय को साथ में बैठने के लिए कहते खाना खाने के लिए कहते
लेकिन बार-बार संजय का एक ही जवाब होता पापा अभी बहुत वक्त है मुझे पढ़ने दो लिखने दो कुछ अच्छा करने दो फिर हम दोनों बैठ के गप्पे मरेंगे ।
और यही कहकर संजय अपने पिताजी लखन की हर एक बात को टाल देता
वक्त बीतता जा रहा था। दिन हफ्ते में सप्ताह महीने में और
महीने साल में व्यतीत होते जा रहे थे।
लखन जब भी चाय पीने के लिए बैठे तो संजय को बुलाते लेकिन संजय मुस्कुरा
कर उनकी बातों को टाल देता फिर लखन भी मुस्कुराकर ध्यान से हटा देते ।
लखन जब भी खाना खाते तो संजय को बुलाते लेकिन
संजय कहता पापा आप खा लो मैं बाद में खा लूंगा।
लेकिन संजय में एक अच्छी बात यह थी कि संजय कभी भी पिता के बातों
का उल्टा जवाब नहीं देता था ।
वक्त का खेल
वह बहुत ही समझदार था और बहुत नेक दिल लड़का था लेकिन उसमें एक कमी यह थी
कि वह पिता के बातों को मुस्कुरा कर टाल देता था ।
दिन मंगलवार शाम के 5:00 बज रहे थे कि अचानक लखन की तबीयत बिगड़ जाती है।
उसके परिवार वाले अस्पताल ले जाते हैं लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था कुछ ही घंटे
में लखन रांची के फेमस रिम्स हॉस्पिटल में अपना दम तोड़ देते हैं ।
पिता लखन दुनिया से विदा
और इस प्रकार लखन दुनिया से विदा ले लेते हैं बेटे को छोड़कर इस दुनिया से चले जाते हैं।
संजय अपने पिता को शमशान घाट ले जाता है और अपने पिता को कंधा देते समय फूट-फूट कर संजय रोने लगता है। पूरे गांव वालों की नजर संजय पर ही टिकी हुई थी ।
संजय को बार-बार चुप करने पर भी संजय चुप नहीं हो रहा था संजय को अब
यह आभास हो रहा था कि मेरे ऊपर से पिता का साया उठ चुका है मैं अनाथ हो चुका हूं।
जैसे तैसे रोटी भी लगता संजय अपने परिवार वालों को संभालने की कोशिश करता है
और पिता का रोते बिलखते दर्द में दाह संस्कार करता है ।
जिम्मेदारियां का पहाड़ और बोझ
पिता लखन के गुजर जाने के बाद घर की सारी जिम्मेदारियां सारा बोझ राहुल के छोटे से कंधों पर आ जाती है।
मां की देख रेख ,बहन की पढ़ाई, खेत का काम ,घर का खर्चा ,
नौकरी की चिंता सब कुछ एक साथ दुखों का पहाड़ जैसे
सामने खड़ा होकर संजय से कुछ कह रहा होता है।
जी संजय को लग रहा था कि मेरे पास बहुत वक्त है मैं जिंदगी में बहुत कुछ कर सकता हूं।
आज इस संजय को ऐसा लग रहा है, कि जैसे मेरे पास 2 मिनट का वक्त नहीं है ।
जिसे मैं सुकून से बैठकर खुद से बातें कर सकूं अब
उसके पास अपने लिए एक पल भी नहीं बचता है।
पिता के देहांत के बाद संजय तन मन से परिवार को खुशियां जुड़ने में लग गया ।
और वह दिन भी आया जब 4 साल बाद संजय कामयाब हुआ।
वह एक अच्छी कंपनी में जब लगा जहां उसका पेमेंट डेढ़ लाख रुपया पर मंथ था।
सब कुछ अच्छा था परिवार के सभी लोगों के चेहरे पर खुशियां थी
गांव में संजय के ऊपर सभी को गर्व था
लेकिन संजय अभी उदास और खोया खोया था।
मन में उठाते हुए तरंग
रात के 12:00 रहे थे एक रात वह अपनी पुरानी तस्वीर लेकर बैठा है तस्वीर को देखते हुए उसकी आंखों से आंसू निकल रहे हैं संजय अंदर ही अंदर रो रहा है ।
उसने धीरे-धीरे कहा पिताजी जब आप थे तब मैं आपके साथ वक्त नहीं बिता पाया
आज मेरे पास सब कुछ है वक्त है पैसा है और मैं कामयाब भी हो चुका हूं।
लेकिन आप नहीं है आपको समय देने का अवसर नहीं है क्या करूं ऐसी
कामयाबी का क्या करूं ऐसे धन का जिसमें मुझे सुकून महसूस नहीं हो रहा है।
यह बोल बोल कर संजय मन ही मन में दिल से रो रहा है
और आज इस दर्द को सुनने वाला कोई नहीं है।
पिता के संस्कार का महत्व
संजय को अब समझ में आ रहा था, कि पिता केवल घर के मुखिया नहीं होते।
वह परिवार को मजबूत बनाने का सबसे सुंदर पेड़ होते हैं जिसके छाए में रहकर जिम्मेदारियां हल्का लगती है।
पिता का साया होता है तो घर वालों पर कोई भी दुख का साया नहीं मान रहा था ।
लेकिन जब वह साया सर से उठ जाता है तब जिम्मेदारियां का ऐसा पहाड़ टूटा है।
कि इंसान चाह कर भी अपने सपनों को पूरा नहीं कर पाता और अगर पूरा कर भी लेता है ,
तो उसके इच्छाएं आज भी पिता के साए में रहने को तड़प रही होती है।
बीते पल वापस कभी नहीं आते
उसे दिन संजय ने एक बात हमेशा हमेशा के लिए सीख लिया कि पिता
के रहते जो करना है कर लो पता नहीं वक्त कब बदल जाए पता नहीं वक्त कब गुजर जाए।
जब पिता होते हैं तो पिता को वक्त दिया कीजिए परिवार वालों के साथ वक्त बिताया करो क्योंकि जब
सर से पिता का साया उठना है तो जिम्मेदारियां आपको बोझ लगने लगती है
और इंसान अंदर से टूटने लगता है।
कहानी से सीख
माता-पिता का सम्मान सबसे जरूरी है और उनकी इच्छाओं का
आदर करना समय रहते हुए कर लेना चाहिए क्योंकि समय बीत जाने के
बाद पछतावे के सिवा और जिंदगी में कुछ भी हाथ नहीं लगता।

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