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वक्त के इम्तिहान में सब्र का फल । hindi success story

वक्त के इम्तिहान में सब्र का फल । hindi success story

वक्त के इम्तिहान में सब्र का फल । The fruit of patience in the test of time.

रामपाल और धर्मपाल दोनों बहुत ही अच्छे दोस्त थे, दोनों की मित्रता की चर्चा पूरे गांव में हुआ करती थी। धीरे-धीरे जब दोनों बड़े हो गए, तो दोनों ने अलग-अलग दुकान करने का फैसला किया । रामपाल ने राशन का दुकान दिया , तो धर्मपाल ने सब्जी का दुकान दिया.

कुछ दिनों तक रामपाल और धर्मपाल दोनों की दुकान बहुत ही अच्छी चली। कस्टमर की बारिश हो रही थी । पल भर का टाइम ही नहीं बचता था , खाना खाने तक का टाइम नहीं बचता था। इस प्रकार दिनचर्या गुजर रहा था।

 

एक और खुशी एक और गम

फिर कुछ दिनों के बाद वक्त ने करवट लिया और धर्मपाल का दुकान कम चलने लगा, और रामपाल का दुकान अच्छा चलने लगा ।

धर्मपाल के मन मे तरह-तरह के विचार आने लगे ,वह कभी भगवान को दोष देता, तो कभी अपनी किस्मत को दोष देता .

लेकिन वक्त बीतता ही जा रहा था, मुनाफा कम और नुकसान ज्यादा हो रहा था । समय भी जा रहा था, पैसा भी जा रहा था ।

तभी उसके पास एक कंपनी में काम करने का ऑफर आया , लेकिन धर्मपाल ने उसे कंपनी के ऑफर को ठुकरा दिया ।

और कहा मुझे नौकर फिर से नहीं बना है मैं मलिक ही बनना चाहत छोटा ही सही लेकिन मैं मलिक बनेगा इसलिए सर आप अपना काम अपने पास रखें.

 

वक्त का इम्तिहान

दिन भर जैसे तैसे दुकान पर बितता। और शाम को दोनों दोस्त एक जगह बैठते । और अपनी दुख सुख की बातें करते।

वक्त के साथ-साथ वक्त ने रामपाल का भी इम्तिहान लिया, अब रामपाल का दुकान भी काम चलने लगा कस्टमर काम आने लगे । और अब वक्त बदलाव और धर्मपाल का दुकान फिर से हरा भरा होने लगा और कस्टमर आने लगे।

लगातार चार महीने तक रामपाल का काम बिल्कुल कम चल रहा था ,यानी कि उसकी दुकान बिल्कुल भी कम चल रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह करें भी तो क्या करें।

 

निराशा की झलक में बिखरते सपना

शाम को रामपाल ने धर्मपाल से कहा: “दोस्त अब मैं दुकान नहीं चल पाऊंगा । तो धर्मपाल ने बदले में उत्तर दिया “रामपाल तुम्हें दुकान चलानी चाहिए, क्योंकि वक्त सबका बदलता है, बहुत समझाने के बाद भी रामपाल ने यह फैसला लिया कि, अब मैं दुकान नहीं चलाऊंगा। मेरी भी दुकान तुम ही ले लो , और तुम ही चलाओ। मैं जाता हूं कंपनी में काम करने ।

धर्मपाल के मानने और समझने के बावजूद भी रामपाल ने अपना डिसीजन नहीं बदला । और आखिरकार उसने दुकान बंद करने का फैसला लिया। लेकिन दोनों इतने जिगरी दोस्त थे, कि दोनों अलग नहीं होना चाहते थे।

दोस्त ने दोस्त की जज्बात को हौसला का उड़ान दिया

 

फिर धर्मपाल ने रामपाल के पापा से बात किया। और कहा “जब तक दुकान नहीं चलता है, तब तक तुम्हारा सारा खर्चा मैं उठाऊंगा । हम दोनों दुख सुख के साथी हैं ,लेकिन तुम दुकान चलाओ ,क्योंकि हम दोनों अब नौकर

नहीं बनेंगे। हम दोनों मलिक बनेंगे, दोस्ती इतनी गहरी थी , कि दोस्त की बातें को वह काट ना सका।

वक्त बदला । और आने वाले वक्त में, दोनों का दुकान अब बड़ा दुकान का रूप ले लिया । और दोनों की दुकान पर कस्टमर की भीड़ लगने लगी।

 

बुरे दिन बीत गए और दोनों की दोस्ती मिसाल बनी

 

ग्राहकों की भीड़ को देखकर पूरे गांव वाले अचंभित होने लगे , और इस प्रकार धर्मपाल और रामपाल ने पूरे गांव में एक दोस्ती का मिसाल और बिजनेस का मिसाल खड़ा कर दिया।

आज धर्मपाल के पास 7 (सात )और रामपाल के पास पांच दुकानें हैं , जिसमें से सारी सुविधाएं दी जाती है ,और फिलहाल रामपाल और धर्मपाल के पास कई नौकर चाकर भी है, जिससे और लोगों का भी गुर्जर बसल चल रहा है।

 

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कहानी से सीख

दोस्तों इस कहानी से हमें यह सीखने के लिए मिलता है, कि सब्र  हमेशा बनाए रखना चाहिए जिसमें सब्र नहीं होता वह बिजनेस या लाइफ में कहीं भी सक्सेसफुल नहीं हो पाए इसलिए । मेहनत के साथ में सब्र का होना भी बहुत जरूरी है।

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